हनुमन्नाटक - श्री हनुमान जी द्वारा रचित रामकथा
कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य।
आदिकाल में श्री हनुमान जी ने शिलाओं पर अपने वज्र सम नखों से श्री रामचन्द्रजी की जीवन गाथा का वर्णन किया। लेखन समाप्त होने के पश्चात श्री हनुमान जी ने महर्षि वाल्मीकि को बुलाकर अपने नाट्य स्वरुप में लिखे ग्रंथ का अध्ययन करने को कहा।
उस अद्भुत वर्णन को पढ़ महर्षि के आँखों से अश्रुधारा बह निकली। महाज्ञानी बजरंगी द्वारा कुछ लिखा तो उसमें त्रुटि की तो संभावना ही नहीं रहती परंतु इस स्तर का वर्णन और ऐसा सौंदर्य व अलंकार देख वाल्मीकि प्रसन्न हो गए।
तदनंतर उस महान ग्रंथ को देख वाल्मीकि के मन में एक विचार का उद्गम हुआ।
ऐसा मनोहर ग्रंथ, ऐसी सुन्दर रचना, प्रभु राम के चरित्र का ऐसा दुर्लभ वर्णन यदि विश्व में प्रचलित हुआ तो मेरे रामायण को कौन पढ़ेगा?
वस्तुतः महर्षि के मन में ऐसे विचार आने नहीं चाहिए थे। वाल्मीकि तो ब्रह्म पद को प्राप्त कर चुके थे (उलटा नाम जपत जग जाना, बालमीकि भये ब्रह्मसमाना)। परंतु प्रभु की प्रेरणा ही थी जो उनसे ये सब करवा रही थी।
वाल्मीकि ने हनुमानजी से कहा, "मैंने आपके ग्रंथ का अध्ययन किया है, तो मुझे गुरु दक्षिणा दीजिए।"
हनुमानजी सहर्ष तैयार हो गए। वाल्मीकि ने मांगा, "आप अपना यह ग्रंथ समुद्र में बहा दीजिए।"
हनुमानजी ने लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। तुरंत ही उन शिलाओं को समुद्र में बहा दिया। परंतु तभी वहां प्रभु स्वयं आ गए। सम्मुख आकर प्रभु ने वाल्मीकि को प्रतिस्पर्द्धा का यह भाव (जो कलियुग प्रमुख भाव है) रखने के कारण कलियुग में अवतरित का आदेश दिया एवं हनुमानजी द्वारा लिखे उस ग्रंथ को पुनः उस जन्म में अपने हाथों लिखने को कहा। तदनंतर वाल्मीकि ने तुलसीदास के रूप में अवतार लेकर श्री राम का जीवन रामचरितमानस के रूप में विश्व के सामने रखा जो कलियुग में कभी जीवों के लिए कल्याण का साधन बना।
जनश्रुतियों व कई पुस्तकों के अनुसार राजा भोज ने इस ग्रंथ के विषय में सुन इसे समुद्र से पुनः प्राप्त किया व दामोदर मिश्र ने संकलन:
रचितमनिलपुत्रेणाथ वाल्मीकिनाब्धौ
निहितममृतबुद्धया प्राङ् महानाटकं यत्।सुमतिनृपतिभोजनोद्धृतं तत्क्रमेण
ग्रथितमवतु विश्वं मिश्रदामोदरेण।।
हनुमन्नाटक के भोज द्वारा उद्धार का वर्णन पृथ्वीराज रासो में भी मिलता है:
पुस्तक जल्हण हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज।
रघुनाथनचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि
पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि॥
हनुमन्नाटक को अपने बृहद आकार व ७९२ श्लोकों की संख्या के कारण महानाटक भी कहते हैं। हनुमन्नाटक व रामचरितमानस की एकरूपता भी बड़ी सुंदर है:⁸
तदा सीता (आत्मगतम् )--
कमठपृष्ठकठोरमिदं धनुर्मधुरमूर्तिरसौ रघुनन्दनः । कथमधिज्यमनेन विधीयतामहह तात पणस्तव दारुणः।। ९
सीता - ( उस समय अपने मन में) यह धनुष कछुए की पीठकी समान कठोर है, और यह रघुकुलके आनन्दको बढ़ाने वाले कुमार श्रीरामचन्द्रजी सुकुमार मूर्ति हैं।
हा ! यह इस धनुषको अभिव्य ( रोदा (प्रत्यंचा) चढ़ा हुआ ) कैसे करेंगे!
इस कारण हे पिताजी ! तुम्हारी "जो कोई धनुषको चढ़ावेगा उसी को सीता दूँगा" यह प्रतिज्ञा बड़ी दुःखदायक है, अर्थात् यदि तुमने यह प्रतिज्ञा न की होती तो इस स्वयंवर में में श्रीरामचन्द्रजी को ही वरती ॥ ९ ॥
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥
रामचरितमानस, बालकांड
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा॥
अच्छी तरह नेत्र भरकर श्रीरामजीकी शोभा देखकर, फिर पिताके प्रणका स्मरण करके सीताजीका मन क्षुब्ध हो उठा। [ वे मन-ही-मन कहने लगीं - ] अहो ! पिताजीने बड़ा ही कठिन हठ ठाना है, वे लाभ-हानि कुछ भी नहीं समझ रहे हैं ॥ १ ॥
कहाँ तो वज्रसे भी बढ़कर कठोर धनुष और कहाँ ये कोमलशरीर किशोर श्यामसुन्दर ! ॥ २ ॥
हनुमन्नाटक के अनुसार रावण को हनुमानजी के रुद्रावतार होने व श्री राम के विष्णु अवतार का भी ज्ञान था। जब हनुमानजी लंका का दहन करते हैं तो रावण के मन में विचार आया कि:
यद्ययं रुद्रो मारुतिस्तहिं किमिति रुद्रभक्तस्य में नगरी दहति अहह ज्ञातम् ।
तुष्टः पिनाकी दशाभिः शिरोभिस्तुष्टो न चैकाद- शको हि रुद्रः। अतो हनूमान्दहतीति कोपा- त्पंक्तोर्हि भेदो न पुनः शिवाय ॥ २७ ॥
(रावण अपने मनही मनमें) यदि यह पवनकुमार रुद्रावतार है तो मुझे रुद्रभक्तकी नगरीको क्यों भस्म करे डालते हैं ? ओहो समझ गया-
पिनाकधारी शिवजी दश मस्तकोंसे प्रसन्न हो गये परन्तु ग्यारहवें रुद्र प्रसन्न न हुए इसी कारण हनुमान् कोपकर लंकाको भस्म कर रहे है सो ठीक ही है क्योंकि पंक्तिका भेद कभी मंगलदायक नहीं होता ||२७||

जानामि सीतां जनकप्रसूतां जानामि रामं मधुसूदनं च। वधं च जानामि निजं दशास्यस्तथापि सीतांनसमर्पयामि। ७,११
जनकके कुल उत्पन्न हुई जानकी को भी मैं जानता हूँ और मधुदैत्यके नाशक विष्णु के अवतार रामको भी जानता हूँ, तथा अपनी मौतको भी जानता हूँ, परन्तु एक मुखवालेको भी अपनी बातकी हठ होती है मैं तो दश मुखवाला हूँ इस कारण सीता नहीं दूंगा ॥ ११ ॥ ऐसा कहकर बाँये पैर से विभीषणको एक लात लगाई ॥
इस ग्रंथ में ही श्री जानकी जी द्वारा प्रभु राम से सेतु दिखाने की भी इच्छा प्रकट की गई है:
दृष्टोऽयं सरितां पतिः प्रियतम क्कास्ते स सेतुः परं
ह•ना• १४,६७
हनुमन्नाटक में श्री राम के राज्याभिषेक के उपरांत अंगद श्री राम के सामने युद्ध के लिए उद्यत हो जाते हैं:
अकस्मात् वानरभटेभ्यः समुत्पत्य पितृहन्तारमवलोक्य दोस्तम्भास्फालकेलिमभिनीय क्रोधं नाटयति॥
१४,७२
रामचन्द्र त्वयादिष्टं यद्यत्तत्तन्मया कृतम्। यतस्त्रैलोक्यनाथोसि न च त्याज्यं गुरोर्वचः॥ ७२ ॥
पश्य श्रीरामचन्द्र त्वदभिमतमहो लक्ष्मणेनापि पूर्णे तूर्णं रङ्गावतारेऽवतरतु स भवानाहतो येन तातः। सुग्रीवेणाञ्जनेयप्रमुखभटचमूचक्रवालेन सार्द्धं त्वामेकेनाङ्गदोहं पितृनिधनमनुस्मृत्य मन्थामि दोष्णा।। ७३
१४,७३
(अंगदजी ) अकस्मात् ही वानर योधाओं से उठकर पिताका वध करनेवाले रामचंद्र को देख भुजदण्डों को ताडन करके क्रोध का नाटक करते हैं।
हे रामचन्द्रजी ! आपने जो-जो मुझसे कहा सो-सो मैंने सभी कुछ किया क्योंकि आप त्रिलोकी स्वामी हो। परन्तु मैं अपने पिता बैर को कभी नहीं भूलूँगा ।। ७२ ।।
हे रामचन्द्रजी ! तुम्हारे प्रियकार्यकर्ता लक्ष्मणजी करके पूर्ण इस संग्राम-भूमिमें जिसने मेरे पिताको मारा है वह और हनुमान आदि वानरोकी सेना के समूह के साथ शीघ्र भाव में अकेला अङ्गद ही अपने पिता के मृत्युके वैको स्मरणकर अपनी बाहुओंसे तुम्हें मथडालूँ ॥ ७३ ॥
इस भाव को सुनकर लक्ष्मण आदि सहित समस्त वानर सेना को अत्यंत क्षोभ हुआ। तभी आकाशवाणी हुई:
आकाशवाण्यभवदेवमहो स वाली दासो हनिष्यति पुनर्मथुरावतारे ।
श्रुत्वा विलोक्य रघुनन्दनवानराणां कारुण्यमञ्जलिपुटं स रणान्निवृत्तः ॥ ७५ ॥
उस समय आकाशवाणी हुई कि हे अंगद ! जब मथुरापुरीमें कृष्ण अवतार होगा तब वाली ही व्याधका रूप धारण करके इन रामचन्द्रजीका वध करेगा, यह सुनकर रामचन्द्रजीको और वानरोंके दीनवृत्तिसे स्थित तथा अंजलि बांधे देखकर अंगदने संग्राम करनेका मानस त्यादिया ॥७५॥
संदर्भ:
- राजा भोज का रचनाविश्व (द्वितीय उच्छवास Pg.13)
- हनुमन्नाटक चौखम्भा प्रकाशन
- हनुमन्नाटक श्लोक
- हनुमन्नाटक १
- हनुमन्नाटक २
- भोज प्रबंध
- संस्कृत साहित्य का इतिहास (पृष्ठ ३४८)
- Journal of the Ganganath Jha Kendriya Sanskrit Vidyapeeth
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